झाबुआ।(जया सेन की रिपोर्ट )आदिवासी अंचल में प्रमुखता से मनाए जाने वाला आदिवासी लोक संस्कृति का प्रमुख पर्व भगोरिया होली के सात दिन पूर्व से मनाया जाता है जिसकी शुरुआत हो चुकी है। भगोरिया शब्द की उत्पत्ति भृगु ऋषि के नाम पर हुई है। क्योंकि यह क्षेत्र ऋषि भृगु की तपोभूमि रहा है। भगोरिया आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस पर्व के आगमन से पूर्व आदिवासी बाहर से वपस अपने-अपने घरों को लौट आते हैं ताकि वे पर्व को मना सके । होली के एक सप्ताह पूर्व सेगने वाले हाट बाजारों में भगोरिया पर्व की धूम मचाने लगती है।
अपने-अपने क्षेत्र में लगने वाले हाट के दौरान आदिवासी विशेष परिधानों मैं सज धज कर निकलते हैं और इस पर्व की सार्थकता को सिद्ध करते हैं। इस भगोरिया पर्व को देखने अब दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। पहले इसे प्रणय पर्व भी कहा जाता था परंतु अब ये भ्रम भी टूट गया है। ऐसा कहा जाता था कि इन मेलों में पुरुष महिलाओं को पान खिलाते हैं, जो महिला पान खा लेती है तो माना जाता था कि वो उससे शादी के लिए राजी है। हालांकि ये परंपरा पूरे आदिवासी समाज की नहीं, वरन कुछ लोगों के बीच थी। मान्यताओं की माने तो झाबुआ जिले में आज भी भगोर गांव है। वैदिक काल से शिव भक्ति की प्रधानता रही है और भृगु ऋषि शिव भक्त थे। भगोर गांव में प्राचीन शिव मंदिर और इसी गांव के समीप पातालेश्वर शिव मंदिर स्थित है। ऐसा माना जाता है भारत में शिल्प कला का प्रारंभ चंद्रगुप्त मौर्य (ईसा से 450 वर्ष पूर्व) के कालखंड में हुआ। किसी कालखंड में भगोर गांव एक विशाल नगर था, यह गांव 1200 वर्ग मील में फैला हुआ था। धार के प्रसिद्ध राजा भोज का राज बांसवाड़ा तक फैला हुआ था,
भगोर इसी राज्य के अंतर्गत आता था। इस क्षेत्र में भील राजा, राजा भोज की अधीनता में ही राज्य करते थे। यह सिद्ध होता है कि भगोरिया पर्व महाशिवरात्रि पर्व का भीली संस्करण है। आदिवासी-भील अंचल के लोग इस पर्व को शिव पार्वती की स्मृति में ही आयोजित करते हैं। आदिवासी-भील अंचल के लोग अपने आप को भगवान शिव का वंशज मानते हैं, पार्वती को वह अपनी बिरादरी की बेटी समझते हैं, इसीलिए भी समुदाय का जीवन महादेव जैसा अक्खड़ व फक्कड़ है। प्राचीन आदिवासी समुदाय के लोग मात्र एक लंगोटी में ही रहते थे। आगामी दिनों में आदिवासी अंचलों में भगोरिया मेलों की धूम रहेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भगोरिया और अन्य जनजाति उत्सव बड़े स्तर पर मनाए जाने की घोषणा की है। इसके बाद भगोरिया के प्रति लोगों में उत्सुकता और बढ़ गई है। जानकारी के अनुसार प्रसिद्ध इतिहासकार जेम्स टॉड अपने समय में राजस्थान की खूबसूरती देखने आए थे। तब राजा भोज का क्षेत्र बांसवाड़ा तक फैला था। जेम्स टॉड ने आदिवासियों और उनकी परंपरा के बारे में सुना और देखने पहुंचे।
तब उन्होंने भगोरिया के बारे में भी जाना और अपनी किताब एनाल्स एंड एंटी क्यूटीज ऑफ राजस्थान में इसका जिक्र किया था। 7 मार्च (शुक्रवार) से झाबुआ जिले में शुरू होने वाले भगोरिया हाट के मेले मसूरिया, भगोर, मांडली, बेकल्दा, कालीदेवी मेघनगर, राणापुर, बामनिया, झकनावदा, रातिमालि, खवासा, चोखवाडा झाबुआ, ढोलियावाड़, रायपुरिया, काकनवानी, आम्बा, चुडेल पेटलावद, रंभापुर, मोहनकोट, बेडावा, कुंदनपुर, कल्मोडा, ढोचका, आमलिया, रजला अंधरवाड़ा, पिटोल, खयंडू थांदला, तारखेड़ी, बरवेट ढेकल, कंजवानी, उमरकोट, माछलिया, करवड़, बोडायता, कल्याणपुरा, मदरानी, ढेकल पारा, हरीनगर, सारंगी, समोई, चैनपुरा में 13 मार्च तक लगेंगे।