कर्नाटक में सियासी समीकरण बदले, MLC चुनाव में कांग्रेस की बढ़त
बेंगलुरु। झारखंड में राज्यसभा चुनाव के दौरान लगे तगड़े झटके के बाद कांग्रेस पार्टी के लिए दक्षिण भारत से एक बेहद सुकून देने वाली खबर सामने आई है। कर्नाटक में संपन्न हुए विधान परिषद के चुनावों में मिली शानदार जीत ने कांग्रेस आलाकमान को बड़ी राहत पहुंचाई है। राज्य की सात विधान परिषद सीटों पर हुए इस कड़े मुकाबले में प्रदेश की सत्तारूढ़ कांग्रेस ने अपने बेहतरीन राजनैतिक कौशल का प्रदर्शन करते हुए पांच सीटों पर कब्जा जमा लिया है। गुरुवार को मतगणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए आधिकारिक परिणामों में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़े और एकतरफा विजेता के रूप में उभरकर सामने आई है। दूसरी तरफ, देश की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को महज दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है, जबकि उसकी क्षेत्रीय सहयोगी दल जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस अपनी पारंपरिक सीट बचाने में पूरी तरह विफल रही और उसके प्रत्याशी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।
क्रॉस वोटिंग के चक्रव्यूह में फंसी भाजपा, झारखंड का बदला कर्नाटक में पूरा
इस पूरे चुनावी समर में सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि जिस प्रकार झारखंड में कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग के कारण गहरा नुकसान उठाना पड़ा था, ठीक उसी तर्ज पर कर्नाटक के भीतर भाजपा को अपनी ही पार्टी के भीतर से बड़ा झटका लगा है। राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि कर्नाटक में भाजपा के अपने ही विधायकों ने ऐन वक्त पर पार्टी लाइन से अलग जाकर क्रॉस वोटिंग की और अपने ही नेतृत्व को धोखा दे दिया। इस अप्रत्याशित राजनैतिक घटनाक्रम को लेकर सियासी पंडितों का मानना है कि कांग्रेस के संकटमोचक और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेहद चालाकी से झारखंड में अपनी पार्टी को मिले जख्मों का हिसाब कर्नाटक की धरती पर भाजपा से बराबर कर लिया है।
सत्तारूढ़ कांग्रेस की सांगठनिक मजबूती और जेडीएस का सूपड़ा साफ
इन चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की जुगलबंदी के चलते कांग्रेस संगठन धरातल पर बेहद मजबूत स्थिति में है। सात में से पांच सीटों पर मिली यह एकतरफा जीत आगामी स्थानीय और निकाय चुनावों के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंकने का काम करेगी। इसके विपरीत, जेडीएस के लिए यह परिणाम किसी दुःस्वप्न से कम नहीं हैं, क्योंकि भाजपा के साथ गठबंधन में होने के बावजूद वे अपने कैडर और विधायकों के मतों को सहेजने में नाकाम रहे, जिसने उनके राजनैतिक वजूद पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अंतर्कलह से जूझती कर्नाटक भाजपा और आगामी संगठन विस्तार पर संकट
बीजेपी खेमे के लिए दो सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद भी इस चुनाव के मायने बेहद चिंताजनक हैं। अपनी ही पार्टी के विधायकों द्वारा बगावत कर कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने से प्रदेश भाजपा की आंतरिक गुटबाजी खुलकर सरेबाजार आ गई है। केंद्रीय नेतृत्व ने इस अनुशासनहीनता और भितरघात को अत्यंत गंभीरता से लिया है। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि भाजपा ने समय रहते अपने विधायकों के इस असंतोष को दूर नहीं किया, तो आने वाले दिनों में राज्य के भीतर पार्टी को और भी बड़े राजनैतिक संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

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