वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में अपना 80वां जन्मदिन मनाया है। इसके साथ ही वे पद पर रहते हुए इस उम्र को छूने वाले अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति बन गए हैं। उनसे पहले जो बाइडेन नवंबर 2022 में राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 80 वर्ष के हुए थे। हालांकि ट्रम्प दुनिया के सबसे बुजुर्ग नेताओं की सूची में शामिल हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर कई ऐसे राष्ट्रप्रमुख हैं जो उम्र के मामले में उनसे काफी आगे हैं।

दुनिया के 91 प्रतिशत राष्ट्रीय नेताओं से बड़े हैं ट्रम्प

एक हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के 186 देशों के राष्ट्रप्रमुखों में से केवल 16 नेता ही ऐसे हैं जिनकी उम्र वर्तमान में डोनाल्ड ट्रम्प से अधिक है। इस लिहाज से ट्रम्प दुनिया के लगभग 91 प्रतिशत राष्ट्रीय नेताओं से अधिक उम्र के हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि इस समय वैश्विक स्तर पर शासन कर रहे नेताओं की औसत आयु करीब 63 वर्ष है, जबकि ट्रम्प इस औसत आंकड़े से काफी ऊपर हैं।

93 वर्षीय पॉल बिया हैं दुनिया के सबसे उम्रदराज मौजूदा शासक

मौजूदा समय में दुनिया के सबसे बुजुर्ग राष्ट्रीय नेता कैमरून के राष्ट्रपति पॉल बिया हैं, जिनकी आयु 93 वर्ष हो चुकी है और वे साल 1982 से लगातार सत्ता में काबिज हैं। इस सूची में दूसरे स्थान पर सऊदी अरब के राजा सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद हैं, जिनकी उम्र 90 वर्ष है और वे 2015 से शासन संभाल रहे हैं। यानी सऊदी किंग उम्र के मामले में ट्रम्प से करीब 10 साल बड़े हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे बुजुर्ग नेताओं में एक बड़ी संख्या अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्षों की है, जिनमें युगांडा, इक्वेटोरियल गिनी, मलावी, आइवरी कोस्ट, जिम्बाब्वे और रिपब्लिक ऑफ कांगो जैसे देश शामिल हैं। युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी 82 वर्ष के हैं और लगभग चार दशकों से सत्ता में हैं।

लंबे कार्यकाल और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर छिड़ी नई बहस

इस रिपोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और चिंताजनक तथ्य भी उजागर किया है। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के दस सबसे उम्रदराज नेताओं में से सात नेता उन देशों का नेतृत्व कर रहे हैं जिन्हें 'फ्रीडम हाउस' (मानवाधिकार और लोकतंत्र पर नज़र रखने वाली संस्था) ने "नॉट फ्री" (स्वतंत्र नहीं) की श्रेणी में रखा है। इसमें इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति तेओदोरो ओबियांग का नाम भी शामिल है जो 1979 से शासन कर रहे हैं। इन आँकड़ों के सामने आने के बाद वैश्विक राजनीति में इस बात को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि नेताओं का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना और लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी आना आपस में किस तरह जुड़े हुए हैं।