एक महीने बाद भी हाथ खाली, नीतीश कुमार की कुर्सी राजनीति पर सवाल
पटना: बिहार की सियासत में पिछले एक महीने के भीतर आए भूचाल ने राजनीतिक पंडितों और नीतीश कुमार को दशकों से जानने वाले करीबियों को भी हैरत में डाल दिया है। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि 'परिवारवाद' के धुर विरोधी रहे नीतीश कुमार इतनी नाटकीयता के साथ मुख्यमंत्री की कुर्सी त्याग देंगे और अपने बेटे निशांत कुमार के राजनीतिक राजतिलक के साक्षी बनेंगे। 14 अप्रैल को उनके इस्तीफे के साथ ही अप्रत्याशित घटनाक्रमों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने जेडीयू के भीतर और बाहर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ अब मुख्य चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि राज्यसभा जाने के फैसले के बदले क्या भाजपा नेतृत्व के साथ किसी विशेष सम्मानजनक पद को लेकर कोई गुप्त समझौता हुआ है।
सत्ता त्याग और राजनीतिक विरासत का हस्तांतरण
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि इसे उनकी राजनीतिक विरासत के हस्तांतरण के रूप में देखा जा रहा है। आश्चर्यजनक यह रहा कि तीन सदनों के सदस्य रह चुके नीतीश ने अचानक राज्यसभा जाने की इच्छा जताई और जब तक विधान परिषद से इस्तीफे की अंतिम तारीख नहीं आई, उन्होंने सस्पेंस बनाए रखा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने बहुत ही सधे हुए तरीके से खुद को पृष्ठभूमि में धकेला ताकि उनके पुत्र निशांत कुमार के लिए कैबिनेट में जगह और पार्टी में सक्रिय भूमिका का मार्ग प्रशस्त हो सके। बेटे के शपथ ग्रहण समारोह में उनकी उपस्थिति ने उस हिचक को भी समाप्त कर दिया जो दशकों तक उनकी छवि का हिस्सा रही थी।
उपमुख्यमंत्री की मांग और भविष्य की कूटनीति
जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने और राज्यसभा की ओर रुख करने का ऐलान किया था, तब जदयू खेमे के भीतर उन्हें देश का उप-प्रधानमंत्री बनाए जाने की मांग ने काफी जोर पकड़ा था। हालांकि वर्तमान में यह मांग सार्वजनिक रूप से भले ही शांत नजर आ रही हो, लेकिन पार्टी के पुराने वफादार अब भी इस उम्मीद में हैं कि केंद्र सरकार में उन्हें कोई अत्यंत प्रभावशाली पोर्टफोलियो या सम्मानजनक ओहदा दिया जाएगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के पीछे जो 'डील' चर्चा में थी, उसका खुलासा आने वाले समय में होगा क्योंकि नीतीश कुमार जैसे कद्दावर नेता को सक्रिय राजनीति से पूरी तरह अलग समझना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है।
दिल्ली की राजनीति और भाजपा की रणनीति
राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार का केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि जिस नेता ने वर्षों तक भाजपा के विरुद्ध विपक्षी मोर्चे की अगुवाई की, यदि वह केंद्र में मंत्री के तौर पर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य करते हैं, तो इससे भाजपा को एक मजबूत मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी। इसके साथ ही, नीतीश कुमार को बिहार की सक्रिय राजनीति से दिल्ली स्थानांतरित करने से भाजपा को राज्य में अपने स्वतंत्र आधार विस्तार और नीतीश के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलने का एक बेहतर अवसर मिल सकता है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और नीतीश की सक्रियता
भले ही सत्ता की कमान अब सम्राट चौधरी के हाथों में है, लेकिन नीतीश कुमार की सक्रियता आज भी शासन और पार्टी के कामकाज में साफ झलकती है। वे न केवल अपने बेटे के मंत्रालय के कार्यों की समीक्षा कर रहे हैं, बल्कि जदयू कोटे के अन्य मंत्रियों के साथ भी निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री भी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि नीतीश कुमार का अनुभव और उनकी उपस्थिति सरकार के लिए कितनी महत्वपूर्ण है, इसीलिए दिल्ली प्रवास हो या पटना में वापसी, सम्राट चौधरी शिष्टाचार के नाते नीतीश से परामर्श लेना नहीं भूलते। हालांकि, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्यसभा में नामांकन के बाद केंद्र की राजनीति में नीतीश कुमार की क्या भूमिका तय होती है।

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