खाईफेमीकी में तबाही के निशान, जसवंत का उजड़ा घर सुनाता दर्द
फिरोजपुर: 'ऑपरेशन सिन्दूर' की त्रासदी ने उजाड़ दी जसवंत की दुनिया, अपनों को खोने के बाद अब सरकारी मदद का इंतजार
सीमावर्ती गांव खाईफेमीकी में आज भी उस भयावह रात के निशान मौजूद हैं, जिसने जसवंत सिंह के हंसते-खेलते परिवार को तहस-नहस कर दिया। जसवंत का पैतृक निवास अब एक वीरान खंडहर में तब्दील हो चुका है, जहां धमाके से दरकी हुई दीवारें और जलकर राख हो चुकी कार उस खौफनाक मंजर की गवाही देती हैं। यादों के इस बोझ और अकेलेपन के डर के कारण जसवंत ने उस घर की चौखट को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया है और अब वह अपने रिश्तेदारों के पास गांव वरियाम वाला में पनाह लिए हुए है। अपनों को खोने का दर्द आज भी जसवंत की आंखों में साफ झलकता है, जब वह उस काली रात को याद करता है जिसने उसे जीवन भर का गहरा जख्म दे दिया है।
मिसाइल हमले ने छीना माता-पिता का साया और झुलस गया जसवंत का शरीर
जसवंत ने नम आंखों से उस मंजर को बयां किया जब वह घर पर अपने मवेशियों की देखरेख कर रहा था और अचानक आसमान से बरसी मिसाइल ने सब कुछ राख कर दिया। पाकिस्तानी ड्रोन द्वारा किए गए इस हमले में जसवंत के सिर से माता-पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया और वह खुद भी आग की लपटों में बुरी तरह झुलस गया था। करीब एक महीने तक अस्पताल के बिस्तर पर मौत से जंग जीतने के बाद वह शारीरिक रूप से तो ठीक हो गया, लेकिन मानसिक रूप से वह आज भी उस नुकसान से उबर नहीं पाया है। पंजाब सरकार ने उसके उपचार का खर्च तो उठाया, परंतु उसके जीवन के जो स्तंभ ढह गए, उनकी भरपाई कोई भी व्यवस्था नहीं कर पाई।
परिवार का भावनात्मक संबल और पुरानी यादों का असहनीय दर्द
पुराने घर की ओर कदम बढ़ाते ही जसवंत का हौसला जवाब दे जाता है और वहां बिखरा सामान उसे अपने माता-पिता की याद में फूट-फूटकर रोने पर मजबूर कर देता है। इस कठिन समय में उसके दादा दर्शन सिंह और चाचा गुरबच्चन सिंह उसके लिए ढाल बनकर खड़े हैं और उसे कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने देते। परिवार का यही निस्वार्थ प्रेम और स्नेह जसवंत के टूटे हुए मन को जोड़ने का एकमात्र सहारा बना हुआ है। हालांकि माता-पिता की कमी उसे हर पल खलती है, लेकिन अपनों का साथ उसे इस असहनीय पीड़ा के बीच भी जीवन में आगे बढ़ने की एक धुंधली सी किरण दिखाता है।
मुआवजे की अधूरी आस और सरकारों की बेरुखी पर छलका परिजनों का दर्द
जसवंत के दादा दर्शन सिंह का मानना है कि दो देशों के बीच की जंग में सबसे बड़ी आहुति एक मासूम और आम परिवार ने दी है, जिसकी कीमत की भरपाई संभव नहीं है। परिवार का कहना है कि दो सदस्यों की जान जाने के बावजूद उन्हें अब तक कोई उचित मुआवजा नहीं मिला है, जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारी आर्थिक और मानसिक क्षति झेलने के बाद भी जसवंत ने अपने स्वाभिमान और साहस को जीवित रखा है और वह अपने दर्द को दबाकर नई शुरुआत करने की कोशिश कर रहा है। यह उसका अदम्य साहस ही है जो उसे इस विपरीत परिस्थिति में भी टूटने से बचाए हुए है।
नौकरी के झूठे आश्वासन और राजनेताओं के वादों की जमीनी हकीकत
हादसे के बाद गांव पहुंचे तमाम राजनीतिक दिग्गजों ने जसवंत को सहारा देने के बड़े-बड़े दावे किए थे, जो अब तक केवल कागजी ही साबित हुए हैं। परिजनों के अनुसार भाजपा नेता राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी सहित कई अन्य नेताओं ने जसवंत को सरकारी नौकरी दिलाने का भरोसा दिलाया था, लेकिन एक साल का लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। परिवार अब केंद्र और राज्य सरकार से पुरजोर मांग कर रहा है कि जसवंत को उसकी योग्यता के अनुसार सरकारी सेवा में लिया जाए ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके। वादों और हकीकत के बीच लटका यह मामला जसवंत के सब्र का इम्तिहान ले रहा है।

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