जयपुर। राजस्थान में बाघ और तेंदुओं के इंसानों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए अब सरकार प्रदेश में 7 नए प्रे-बेस सेंटर शुरू करने जा रही है। इन प्रे-बेस सेंटर्स पर बाघ व तेंदुओं के प्राकृतिक शिकार की आबादी बढ़ाई जाएगी और बाद में इन्हें जंगलों में छोड़ा जाएगा ताकि बाघ और तेंदुओं का इंसानी आबादी की तरफ पलायन रोका जा सके और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं कम हों। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार जंगलों में शिकार की कमी होने पर तेंदुए और अन्य शिकारी जानवर भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर चले आते हैं। ऐसे में मवेशियों या इंसानों पर हमले की घटनाएं बढ़ जाती हैं। यदि जंगलों में पर्याप्त शिकार उपलब्ध होगा तो ये जानवर अपने प्राकृतिक आवास में ही रहेंगे। अक्टूबर 2024 में उदयपुर में एक तेंदुए द्वारा आठ लोगों की जान लेने की घटना के बाद इस तरह के केंद्र विकसित करने की जरूरत और भी ज्यादा महसूस की गई। उस तेंदुए को बाद में आदमखोर घोषित किया गया था। इस घटना ने वन विभाग को कुछ इलाकों में फूड चेन के असंतुलन पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया। इस वर्ष जयपुर के रिहायशी क्षेत्रों में भी लगभग एक दर्जन बार तेंदुओं के दिखाई देने की घटनाएं सामने आई हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में शिकार की घटती संख्या भी इसके पीछे एक बड़ा कारण है। यह पहल राज्य के 2025-26 के बजट का हिस्सा है, जिसमें करीब 30 करोड़ रुपये की लागत से राजस्थान में 20 प्रे-बेस ऑग्मेंटेशन एनक्लोजर विकसित करने का प्रस्ताव है। ये केंद्र केवल टाइगर रिजर्व में ही नहीं, बल्कि वन्यजीव अभयारण्यों, कंजरवेशन रिजर्व और अन्य वन क्षेत्रों में भी बनाए जाएंगे। इन केंद्रों में हिरण और काले हिरण जैसे शाकाहारी जीवों का प्रजनन और पालन-पोषण किया जाएगा। बाद में इन्हें नजदीकी जंगलों में छोड़ा जाएगा, ताकि प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता बढ़े और पारिस्थितिक संतुलन बेहतर हो सके। पहले चरण में बनाए जा रहे सात एनक्लोजर लगभग 15 से 20 हेक्टेयर क्षेत्र में होंगे और इनमें मुख्य रूप से चीतल (स्पॉटेड डियर) रखे जाएंगे। इन चीतलों को भरतपुर स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान से लाकर इन केंद्रों में बसाया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत करीब 2000 से 2500 चीतलों को स्थानांतरित करने की योजना है। वन अधिकारियों का कहना है कि जब इनकी संख्या स्थिर हो जाएगी, तब इन्हें जंगलों में छोड़ा जाएगा। इससे बाघ और तेंदुए जैसे शिकारी जानवरों के लिए शिकार की उपलब्धता बढ़ेगी, पारिस्थितिक संतुलन मजबूत होगा और राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी आने की उम्मीद है।